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गीता शृंखला — अध्याय 2

स्थितप्रज्ञ के लक्षण — गीता से

डॉ. प्रिया शर्मा5 जून 20266 मिनट पढ़ें

जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह सुख-दुख में कैसे सम रहता है — गीता का व्यावहारिक उपदेश।

स्थितप्रज्ञ के लक्षण — गीता से

गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ — जिसकी बुद्धि स्थिर है — के चरित्र का सुंदर वर्णन मिलता है।

स्थितप्रज्ञ कौन है?

जिसने इन्द्रियों को विषयों से हटा लिया है, पर इन्द्रियाँ उसे वश में नहीं करतीं, वह स्थितप्रज्ञ है। वह शीत-उष्ण, सुख-दुख में सम है।

मन की स्थिरता

ज्ञान से मन शांत होता है; शांत मन से स्मृति दृढ़ होती है; दृढ़ स्मृति से बुद्धि स्थिर होती है। इसी क्रम से आध्यात्मिक प्रगति होती है।

हमारे लिए सीख

प्रतिदिन कुछ मिनट ध्यान, शास्त्र पATHन और सत्संग — ये स्थितप्रज्ञ बनने के साधन हैं। लक्ष्य पूर्णता नहीं, निरंतर अभ्यास है।

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