
भगवद्गीता
संख्या योग — अध्याय 2 का सार
अर्जुन के शोक से स्थितप्रज्ञ तक — द्वितीय अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ संक्षेप में।
डॉ. प्रिया शर्मा · 7 मिनट पढ़ें
गीता शृंखला — अध्याय 2
जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह सुख-दुख में कैसे सम रहता है — गीता का व्यावहारिक उपदेश।

गीता के दूसरे अध्याय में स्थितप्रज्ञ — जिसकी बुद्धि स्थिर है — के चरित्र का सुंदर वर्णन मिलता है।
जिसने इन्द्रियों को विषयों से हटा लिया है, पर इन्द्रियाँ उसे वश में नहीं करतीं, वह स्थितप्रज्ञ है। वह शीत-उष्ण, सुख-दुख में सम है।
ज्ञान से मन शांत होता है; शांत मन से स्मृति दृढ़ होती है; दृढ़ स्मृति से बुद्धि स्थिर होती है। इसी क्रम से आध्यात्मिक प्रगति होती है।
प्रतिदिन कुछ मिनट ध्यान, शास्त्र पATHन और सत्संग — ये स्थितप्रज्ञ बनने के साधन हैं। लक्ष्य पूर्णता नहीं, निरंतर अभ्यास है।

भगवद्गीता
अर्जुन के शोक से स्थितप्रज्ञ तक — द्वितीय अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ संक्षेप में।
डॉ. प्रिया शर्मा · 7 मिनट पढ़ें

भगवद्गीता
गीता के तीसरे अध्याय से — फल की चिंता छोड़कर कर्म करने का उपदेश, दैनिक जीवन में अभ्यास और शांति का मार्ग।
डॉ. प्रिया शर्मा · 8 मिनट पढ़ें