
भगवद्गीता
संख्या योग — अध्याय 2 का सार
अर्जुन के शोक से स्थितप्रज्ञ तक — द्वितीय अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ संक्षेप में।
डॉ. प्रिया शर्मा · 7 मिनट पढ़ें
गीता शृंखला — अध्याय 3
गीता के तीसरे अध्याय से — फल की चिंता छोड़कर कर्म करने का उपदेश, दैनिक जीवन में अभ्यास और शांति का मार्ग।

श्रीमद्भगवद्गीता के तीसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म योग का उपदेश देते हैं। कर्म करना मनुष्य का स्वभाव है, परन्तु फल की आसक्ति मन को बाँधती है। निष्काम कर्म ही मुक्ति का मार्ग है।
कर्म योग का अर्थ है — अपने कर्तव्य का पालन बिना फलेच्छा के। जब हम कर्म करते समय केवल 'मेरा क्या लाभ होगा' सोचते हैं, तो मन अशांत रहता है। गीता कहती है: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
कार्यस्थल पर ईमानदारी, परिवार में कर्तव्य, और समाज के प्रति उत्तरदायित्व — ये सब निष्काम कर्म के क्षेत्र हैं। प्रत्येक कर्म को पूजा की भाँति करें; परिणाम ईश्वर पर छोड़ दें।
योगस्थः कuru कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय — योग में स्थित होकर, आसक्ति त्यागकर कर्म करो, अर्जुन।
निष्काम कर्म से मन शुद्ध होता है, बुद्धि स्थिर रहती है, और जीवन में शांति आती है। यही गीता का केंद्रीय संदेश है।

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अर्जुन के शोक से स्थितप्रज्ञ तक — द्वितीय अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ संक्षेप में।
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जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह सुख-दुख में कैसे सम रहता है — गीता का व्यावहारिक उपदेश।
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