
भगवद्गीता
कर्म योग का परिचय — निष्काम कर्म
गीता के तीसरे अध्याय से — फल की चिंता छोड़कर कर्म करने का उपदेश, दैनिक जीवन में अभ्यास और शांति का मार्ग।
डॉ. प्रिया शर्मा · 8 मिनट पढ़ें
गीता शृंखला — अध्याय 2
अर्जुन के शोक से स्थितप्रज्ञ तक — द्वितीय अध्याय की प्रमुख शिक्षाएँ संक्षेप में।

द्वितीय अध्याय में संजय अर्जुन की स्थिति का वर्णन करते हैं और श्रीकृष्ण संन्यास तथा सांख्य योग का प्रारम्भिक उपदेश देते हैं।
युद्ध के मैदान में अर्जुन शरीर-संबंधियों के विनाश से विचलित हो जाते हैं। श्रीकृष्ण उन्हें बताते हैं कि आत्मा नश्वर शरीर से परे है; कर्तव्य त्याग पाप की ओर ले जाता है।
जो व्यक्ति सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय में समान रहता है, वही स्थितप्रज्ञ कहलाता है। यह अध्याय मन के संतुलन की नींव रखता है।
संख्या अध्याय गीता की दार्शनिक नींव है। पाठक यहाँ से आत्म-ज्ञान, कर्म और ध्यान के संबंध को समझना शुरू करता है।

भगवद्गीता
गीता के तीसरे अध्याय से — फल की चिंता छोड़कर कर्म करने का उपदेश, दैनिक जीवन में अभ्यास और शांति का मार्ग।
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भगवद्गीता
जिसकी बुद्धि स्थिर है, वह सुख-दुख में कैसे सम रहता है — गीता का व्यावहारिक उपदेश।
डॉ. प्रिया शर्मा · 6 मिनट पढ़ें