श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 33-
येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च। त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च ।। 33।।
येषाम्, अर्थे, काङ्क्षितम्, नः, राज्यम्, भोगाः, सुखानि, च। ते, इमे, अवस्थिताः, युद्धे, प्राणान्, त्यक्त्वा, धनानि, च।
येषाम् = जिनके, अर्थे = लिये ,काङ्क्षितम् = अभिलषित है , नः = हमें , राज्यम् = राज्य , भोगाः = भोग , सुखानि = सुख , च = और, ते = वे ,इमे = ये ,अवस्थिताः = खड़े हैं , युद्धे = युद्ध में , प्राणान् = प्राणों को , त्यक्त्वा = त्यागकर ,धनानि = धन को , च = और।
अर्थ - जिनके लिये हमारी राज्य, भोग और सुखकी इच्छा है, वे ही ये सब अपने प्राणों की और धन की आशा का त्याग करके युद्ध में खड़े हैं।
“येषामर्थे काङ्क्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च” -अर्जुन कहते हैं कि हम राज्य, सुख और भोग आदि जो कुछ भी चाहते हैं, वह अपने व्यक्तिगत सुख के लिये नहीं चाहते। हमारा उद्देश्य केवल अपना सुख नहीं है, बल्कि इन कुटुम्बियों, प्रेमियों और मित्रों का सुख है।
हम चाहते हैं कि हमारे आचार्य, पिता, पितामह, पुत्र आदि सब सुखी रहें, उन्हें सुविधा और आराम मिले, उनकी सेवा हो और वे प्रसन्न रहें। इन्हीं के सुख और कल्याण के लिये हम राज्य प्राप्त करना चाहते हैं और भोग-सामग्री एकत्र करना चाहते हैं।
अर्जुन के लिए राज्य, सुख और भोग का क्या उद्देश्य था?
“त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च" - किन्तु अब स्थिति यह है कि वे ही सभी प्रियजन अपने प्राणों और धन की आशा का त्याग करके युद्धभूमि में हमारे सामने खड़े हैं। उन्होंने यह निश्चय कर लिया है कि उन्हें न अपने प्राणों का मोह है और न धन की इच्छा। वे युद्ध से पीछे हटने के लिये तैयार नहीं हैं, चाहे उन्हें अपने प्राणों का त्याग ही क्यों न करना पड़े।
अर्जुन का भाव यह है कि यदि ये सभी प्रियजन युद्ध में मारे जायँगे, तो फिर हमें राज्य किसके लिये चाहिये? सुख किसके लिये चाहिये? और धन किसके लिये चाहिये? जब जिनके लिये राज्य, सुख और भोग की इच्छा की जाती है, वही लोग नहीं रहेंगे, तो इन सबका कोई अर्थ नहीं रह जायेगा।
“प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च”- इसका तात्पर्य यह है कि उन्होंने वास्तव में अपने प्राणों और धन की आशा का त्याग कर दिया है। उन्होंने यह इच्छा छोड़ दी है कि वे जीवित रहेंगे या उन्हें धन प्राप्त होगा।
यदि उनमें प्राणों और धन की इच्छा होती, तो वे युद्धभूमि में मरने के लिये खड़े ही क्यों होते? अतः यहाँ प्राण और धन का त्याग करने का अर्थ उनकी आशा और मोह का त्याग करना है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 33 में अर्जुन क्या कहते हैं?
अर्जुन कहते हैं कि जिनके लिए राज्य, भोग और सुख की इच्छा है, वही प्रियजन अपने प्राण और धन की आशा छोड़कर युद्ध में खड़े हैं।
अर्जुन राज्य और सुख किसके लिए चाहते थे?
अर्जुन अपने कुटुम्बियों, प्रेमियों, मित्रों, आचार्य, पिता, पितामह और पुत्र आदि के सुख और कल्याण के लिए राज्य और सुख चाहते थे।
अर्जुन को राज्य और भोग व्यर्थ क्यों लगने लगे?
अर्जुन को लगता है कि यदि जिन प्रियजनों के लिए राज्य, सुख और भोग चाहिए, वही युद्ध में मारे जाएंगे, तो इन सबका कोई अर्थ नहीं रह जाएगा।
“प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च” का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है कि युद्ध में खड़े लोगों ने अपने प्राणों और धन की आशा छोड़ दी है और वे युद्ध से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं।
श्लोक 33 में अर्जुन का मुख्य भाव क्या है?
अर्जुन का मुख्य भाव यह है कि प्रियजनों के बिना राज्य, सुख और भोग का कोई मूल्य नहीं है। उनके लिए इन वस्तुओं का उद्देश्य अपने लोगों का सुख और कल्याण था।








