मनुस्मृति 10.63
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽभ्रवन्मुनिः ॥
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इंद्रिय संयम — यह सारांश धर्म मुनि ने चार वर्णों के लिए कहा है।

संस्कृत श्लोक, हिंदी अर्थ और जीवन में उपयोग — प्रतिदिन एक नई सीख के साथ आध्यात्मिक यात्रा पर निकलें।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
भगवद गीता 2.47
अर्थ
तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फलों पर नहीं। कर्म के फल को लेकर मत बनो और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।

अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽभ्रवन्मुनिः ॥
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इंद्रिय संयम — यह सारांश धर्म मुनि ने चार वर्णों के लिए कहा है।
सत्यमेव जयते नानृतं सत्येन पन्था विततो देवयानः ।
सत्य की ही जय होती है, असत्य की नहीं — सत्य से ही देवयान मार्ग प्रशस्त होता है।