योगः कर्मसु कौशलम् ॥
योग कर्म में कुशलता है — बिना आसक्ति के कर्म करना ही सच्चा योग है।

संस्कृत श्लोक, हिंदी अर्थ और जीवन में उपयोग — प्रतिदिन एक नई सीख के साथ आध्यात्मिक यात्रा पर निकलें।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
भगवद गीता 2.47
अर्थ
तुम्हें केवल कर्म करने का अधिकार है, उसके फलों पर नहीं। कर्म के फल को लेकर मत बनो और कर्म न करने में भी आसक्ति मत रखो।

योगः कर्मसु कौशलम् ॥
योग कर्म में कुशलता है — बिना आसक्ति के कर्म करना ही सच्चा योग है।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि । तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्य् अन्यानि संयाति नवानि देही ॥
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए पहनता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नया धारण करती है।
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते । क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
हे पार्थ, कायर मत बनो — यह तुम्हारे योग्य नहीं। हृदय की दुर्बलता त्यागकर उठ खड़े हो, परंतप।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
हे भारत, जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आपको प्रकट करता हूँ।
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
साधुओं के उद्धार, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में अवतरित होता हूँ।
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु । मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥
मुझमें मन लगाओ, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो — इस प्रकार मेरे परायण होकर तुम मुझे ही प्राप्त होगे।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
सब धर्मों को छोड़कर केवल मेरी शरण में आओ — मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
मनुष्य को अपने आप से अपना उद्धार करना चाहिए, अपने को नीचे नहीं गिराना चाहिए — आत्मा ही आत्मा का मित्र और शत्रु है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥
दोषयुक्त भी अपना धर्म पराए धर्म से श्रेष्ठ है — अपने धर्म में मरना भी कल्याणकारी है, परधर्म भय उत्पन्न करता है।