पिछले लेख में आपने पढ़ा कि नारद मुनि ने सनत्कुमारों को रामायण की महिमा सुनाई थी। इसके बाद सनत्कुमारों ने ब्राह्मण सौदास की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की। तब नारद जी ने उनके सामने सौदास की पूरी कथा सुनानी शुरू की।
गुरु की अवहेलना से मिला महादेव का श्राप-
नारद जी ने कहा कि सतयुग में एक ब्राह्मण हुआ करते थे, जिनका नाम सोमदत्त था और वे सौदास के नाम से भी प्रसिद्ध थे। उन्होंने गंगा जी के मनोरम तट पर ब्रह्मवादी गौतम ऋषि से संपूर्ण धर्मों का उपदेश सुना था। सौदास को शास्त्रों और धर्म से जुड़ी कथाओं का अच्छा ज्ञान था। वे प्रतिदिन धर्म-कथाओं का श्रवण करते थे और धार्मिक विधि-विधान के अनुसार अपना जीवन बिताते थे।
एक दिन ब्राह्मण सौदास भगवान महादेव की आराधना में लीन थे। उसी समय उनके गुरु गौतम ऋषि वहां पहुंचे। सौदास ने पूजा में व्यस्त होने के कारण अपने गुरु का उठकर प्रणाम नहीं किया। गौतम ऋषि ने उनकी इस बात का बुरा नहीं माना। वे तो यह देखकर प्रसन्न हुए कि उनका शिष्य शास्त्रों में बताए गए विधि-विधान के अनुसार भगवान की आराधना कर रहा है।
लेकिन जिस महादेव की सौदास पूजा कर रहे थे, वे गुरु की अवहेलना से प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने उसी समय सौदास को श्राप दिया कि वह असुर हो जाए। श्राप मिलते ही सौदास घबरा गए और अपने गुरु गौतम ऋषि से पूछा कि वे इस श्राप से कैसे मुक्त होंगे।
गौतम ऋषि ने उन्हें समझाया कि वे चिंता न करें। उन्होंने कहा कि कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में रामायण की अमृतमयी कथा का श्रवण करना। इससे महादेव के श्राप से मुक्ति मिलेगी और यह श्राप केवल 12 वर्षों तक ही रहेगा।
गौतम ऋषि के वहां से चले जाने के बाद सोमदत्त दुखी होकर राक्षस शरीर में प्रवेश कर गए। वे हमेशा भूख-प्यास से परेशान रहते और क्रोध के कारण हिंसक हो गए। निर्जन वन में घूमते हुए एक दिन उनकी नजर गर्ग ऋषि पर पड़ी, जो भगवान श्रीराम के नाम का गान करते हुए वहां से जा रहे थे।
राक्षस बने सौदास ने गर्ग ऋषि को देखकर सोचा कि आज उसे भोजन मिल गया। वह उन्हें खाने के लिए दौड़ा, लेकिन मुनि का कुछ भी बिगाड़ नहीं सका। तब सौदास ने कहा कि उसने बहुत से लोगों को मार डाला है, लेकिन वह उनका कुछ नहीं कर पा रहा है क्योंकि गर्ग ऋषि के पास राम नाम का आश्रय है।
नौ दिन रामायण सुनते ही दूर हुआ असुरत्व-
सौदास ने गर्ग ऋषि को अपनी पूरी बात बताई। उसने कहा कि उसके गुरु गौतम ऋषि ने उसे कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में रामकथा सुनने के लिए कहा था, जिससे भगवान शिव के श्राप से मुक्ति मिल सके। इसके बाद उसने गर्ग मुनि से रामायण की कथा सुनाने का निवेदन किया।
रामायण की महिमा बताते हुए कहा गया है कि जो मनुष्य श्रीराम के ध्यान में लगा रहता है, उसे कौन बाधा पहुंचा सकता है। जहां रामायण का श्रवण होता है, वहां ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी निवास माना गया है।
गर्ग मुनि ने सौदास को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में लगातार नौ दिनों तक रामायण की कथा सुनाई। कथा सुनते ही उसके भीतर का असुरत्व दूर हो गया। राक्षस का शरीर समाप्त हुआ और वह देवताओं के समान सुंदर हो गया। उसके शरीर से भगवान नारायण जैसी दिव्य कांति प्रकट होने लगी।
इसके बाद वह चार भुजाओं वाले दिव्य स्वरूप में दिखाई दिया। उसके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म सुशोभित थे। वह गर्ग मुनि की भूरि-भूरि प्रशंसा करता हुआ भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम को चला गया। इस प्रकार रामायण की कथा के श्रवण से सौदास को महादेव के श्राप और राक्षस योनि से मुक्ति मिली।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-राह्मण सौदास का वास्तविक नाम क्या था?
सौदास का नाम सोमदत्त बताया गया है और वे सौदास नाम से भी प्रसिद्ध थे।
2-सौदास को राक्षस बनने का श्राप किसने दिया था?
सौदास को भगवान महादेव ने असुर बनने का श्राप दिया था।
3-सौदास के गुरु कौन थे?
सौदास के गुरु ब्रह्मवादी गौतम ऋषि थे।
4-सौदास को श्राप से मुक्ति कैसे मिली?
गर्ग मुनि से कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष में नौ दिनों तक रामायण की कथा सुनने के बाद उनका असुरत्व दूर हो गया।
5-मुक्ति के बाद सौदास कहां गए?
दिव्य स्वरूप प्राप्त करने के बाद सौदास भगवान विष्णु के वैकुंठ धाम को चले गए।









