सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन को सनकादि ऋषि कहा जाता है। ये चारों ब्रह्मा जी के पुत्र माने गए हैं और जन्म से ही ब्रह्मचारी हैं। अहंकार से दूर रहने वाले ये महात्मा भगवान विष्णु के भक्त और सदा ब्रह्म के चिंतन में लगे रहते हैं।
एक दिन ये चारों महातेजस्वी ऋषि मेरु पर्वत के शिखर पर ब्रह्मा जी की सभा देखने पहुंचे। वहां भगवान विष्णु के चरणों से प्रकट हुई पवित्र गंगा बह रही थी। गंगा के दर्शन करने के बाद वे स्नान के लिए जाने लगे, तभी भगवान के नामों का स्मरण करते हुए देवर्षि नारद वहां आ पहुंचे।
नारद जी को देखकर सनकादि ऋषियों ने उनकी पूजा की और नारद जी ने भी उन्हें प्रणाम किया। इसके बाद सनत्कुमार जी ने नारद जी से भगवान विष्णु के स्वरूप और उनकी महिमा के बारे में जानने की इच्छा प्रकट की।
सनत्कुमार ने नारद जी से भगवान विष्णु के स्वरूप के बारे में क्या पूछा?
सनत्कुमार जी ने कहा-हे नारद जी! आप सभी मुनियों में श्रेष्ठ हैं और हमेशा भगवान विष्णु की भक्ति में लगे रहते हैं। आपसे बढ़कर भगवान की भक्ति और उनके स्वरूप को जानने वाला कौन हो सकता है?
उन्होंने आगे पूछा कि जिन भगवान विष्णु के चरणों से पवित्र गंगा प्रकट हुई और जिनसे इस पूरे चराचर जगत की उत्पत्ति हुई, उनके वास्तविक स्वरूप को किस प्रकार जाना जा सकता है? यदि आप हम पर कृपा करें तो इस विषय को ठीक प्रकार से समझाइए।
ऋषियों की बात सुनकर नारद जी ने सबसे पहले भगवान श्रीराम को प्रणाम किया। उन्होंने कहा कि जो परम देव सबसे श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ हैं, जिनका निवास स्थान सर्वोत्तम है और जो सगुण तथा निर्गुण दोनों रूपों में विद्यमान हैं, उन श्रीराम को मेरा प्रणाम है।
नारद जी ने कहा कि ज्ञान और अज्ञान, धर्म और अधर्म, विद्या और अविद्या जैसे सभी शब्द जिनके स्वरूप से जुड़े हैं और जो प्रत्येक प्राणी के भीतर आत्मा के रूप में स्थित हैं, उन परमेश्वर को मेरा नमन है।
उन्होंने आगे श्रीराम की महिमा बताते हुए कहा कि भगवान दैत्यों का विनाश करने वाले और अधर्म का अंत करने वाले हैं। अपने बाहुबल और संकेत मात्र से धर्म की रक्षा करते हैं। पृथ्वी का भार कम करना भी उनके लिए किसी बड़े प्रयास का विषय नहीं है। ऐसे रघुकुल के दीपक भगवान श्रीराम को मैं बार-बार प्रणाम करता हूं।
नारद जी कहते हैं कि भगवान श्रीराम के इतने अनगिनत चरित्र हैं कि करोड़ों वर्षों तक भी उनका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता। जब मनु और बड़े-बड़े मुनि भी भगवान के नाम की महिमा का पूरा वर्णन नहीं कर सकते, तो मेरे जैसे साधारण जीव की क्या सामर्थ्य है?
जिन श्रीराम के नाम का स्मरण मात्र करने से बड़े-बड़े पापी भी पवित्र हो जाते हैं, उनकी स्तुति करना मेरे जैसे छोटे जीव के लिए भी आसान नहीं है।
कलयुग में रामायण का श्रवण क्यों करना चाहिए?
नारद जी ने सनकादि ऋषियों से कहा कि घोर कलयुग में जो लोग रामायण की कथा का आश्रय लेते हैं, वे धन्य हैं। ऐसे लोगों को भी सम्मानपूर्वक प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने श्रीराम की कथा का सहारा लिया है।
उन्होंने सनत्कुमार जी से कहा कि भगवान की महिमा को जानने और श्रीराम की भक्ति प्राप्त करने के लिए कार्तिक, माघ और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में रामायण की अमृतमयी कथा का श्रवण करना चाहिए।
इसी प्रसंग में एक ब्राह्मण की कथा भी आती है, जो गौतम ऋषि के श्राप से राक्षस योनि को प्राप्त हो गया था। रामायण के प्रभाव से ही उसे उस श्राप से मुक्ति मिली।
यह बात सुनकर सनत्कुमार जी की जिज्ञासा और बढ़ गई। उन्होंने नारद जी से पूछा-हे मुनिवर! रामायण की कथा सबसे पहले किसने कही? वह ब्राह्मण गौतम ऋषि के श्राप का भागी कैसे बना? और रामायण के प्रभाव से उसे किस प्रकार मुक्ति मिली?
सनत्कुमार ने कहा कि यदि आप हम लोगों पर कृपा करें तो इस पूरी कथा को विस्तार से सुनाइए।
यहीं से आगे की कथा शुरू होती है कि रामायण का वर्णन किसने किया, भगवान शंकर के श्राप से वह ब्राह्मण राक्षस कैसे बना और श्रीराम की कथा के प्रभाव से उसे मुक्ति कैसे मिली। यह कथा अगले लेख में जारी रहेगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-सनकादि ऋषि कौन थे?
सनक, सनन्दन, सनत्कुमार और सनातन को सनकादि ऋषि कहा जाता है। इन्हें ब्रह्मा जी के पुत्र और भगवान विष्णु के भक्त माना गया है।
2-सनत्कुमार ने नारद जी से क्या पूछा?
सनत्कुमार ने भगवान विष्णु के वास्तविक स्वरूप और उनकी महिमा को जानने के लिए नारद जी से प्रश्न किया।
3-नारद जी ने किसकी महिमा का वर्णन किया?
नारद जी ने भगवान श्रीराम की महिमा का वर्णन किया और उन्हें सगुण-निर्गुण दोनों रूपों में परम देव बताया।
4-रामायण का श्रवण किन महीनों में करने की बात कही गई है?
नारद जी के अनुसार कार्तिक, माघ और चैत्र मास के शुक्ल पक्ष में रामायण की कथा सुनने की बात कही गई है।
5-अगले प्रसंग में क्या बताया जाएगा?
अगले प्रसंग में रामायण की रचना और उसके वर्णन से जुड़ी कथा के साथ भगवान शंकर के श्राप से ब्राह्मण के राक्षस बनने और रामायण के प्रभाव से मुक्ति की कथा बताई जाएगी।









