एक समय की बात है। धर्म के ज्ञाता, पराक्रमी और प्रभावशाली राजा दशरथ के जीवन में सब कुछ होते हुए भी एक कमी थी। उनके पास कोई पुत्र नहीं था। यही चिंता उनके मन को भीतर-ही-भीतर व्याकुल करती रहती थी। राजवैभव, समृद्धि और कीर्ति के बीच भी उनका हृदय निरंतर इसी अभाव से व्यथित रहता था कि उनके वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई उत्तराधिकारी नहीं है। अन्ततः एक दिन उस महाबुद्धिमान और धैर्यवान नरेश के मन में एक दृढ़ संकल्प उत्पन्न हुआ, ‘क्यों न मैं पुत्र प्राप्ति के लिये शास्त्रविधि से अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान करूँ?’
यह विचार आते ही उन्होंने अपने प्रिय मन्त्री सुमन्त्र को बुलाकर कहा- ‘मन्त्रिवर! तुम शीघ्र ही मेरे समस्त गुरुजनों और पुरोहितों को यहाँ बुला लाओ।’ राजा की आज्ञा पाकर सुमन्त्र बिना विलम्ब किये उन सभी वेदविद्या में पारंगत मुनियों को बुलाने चले गये। शीघ्र ही सुयज्ञ, वामदेव, जाबालि, कश्यप और कुलपुरोहित वसिष्ठ सहित अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ उपस्थित हुए। राजा दशरथ ने उनका यथोचित सम्मान और पूजन किया। फिर अत्यन्त विनम्रता और मधुर वाणी में अपनी मनोव्यथा प्रकट करते हुए बोले, ‘मैं पुत्र के अभाव में सदा दुःखी रहता हूँ। मेरी इच्छा है कि शास्त्रानुसार यज्ञ करूँ।
कृपा करके आप सब विचार करें कि मुझे पुत्र प्राप्ति का उपाय कैसे प्राप्त हो सकता है।’ राजा की यह विनम्र प्रार्थना सुनकर वसिष्ठ आदि सभी ब्राह्मण अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने एक स्वर में कहा, ‘राजन्! यह अत्यन्त उत्तम विचार है। सरयू नदी के उत्तर तट पर यज्ञभूमि का निर्माण कराया जाए। इस यज्ञ के प्रभाव से आपको अवश्य ही मनोवाञ्छित पुत्र प्राप्त होगा।’ ब्राह्मणों के वचन सुनकर राजा दशरथ के हृदय में प्रसन्नता और आशा का संचार हुआ। उन्होंने तुरंत अपने मन्त्रियों को आदेश दिया, ‘बलवान वीरों की रक्षा में अश्व को छोड़ा जाए और सरयू के उत्तर तट पर यज्ञ की समुचित व्यवस्था की जाए।’
मन्त्रीगण ने भी राजा की आज्ञा को सहर्ष स्वीकार किया और कहा, 'जैसी आपकी आज्ञा, वैसा ही होगा।’ इसके बाद राजा दशरथ अपने महल में लौट आये। वहाँ जाकर उन्होंने अपनी प्रिय रानियों से स्नेहपूर्वक कहा, ‘देवियो! आप सब दीक्षा ग्रहण करें। मैं पुत्र प्राप्ति के लिये यज्ञ का अनुष्ठान करने जा रहा हूँ।’ राजा के इन मधुर और आशापूर्ण वचनों को सुनकर रानियों के मुख ऐसे खिल उठे, जैसे वसन्त ऋतु में कमल प्रस्फुटित हो उठते हैं। उनके हृदय में भी नई आशा और प्रसन्नता का संचार हो गया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-राजा दशरथ अश्वमेध यज्ञ क्यों करना चाहते थे?
राजा दशरथ पुत्र के अभाव से चिंतित थे। वंश को आगे बढ़ाने और पुत्र प्राप्ति की इच्छा से उन्होंने शास्त्रविधि के अनुसार अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प लिया।
2-राजा दशरथ ने यज्ञ के संबंध में किससे सलाह ली?
राजा दशरथ ने अपने मंत्रियों और गुरुजनों को बुलाया। महर्षि वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, कश्यप और सुयज्ञ सहित अनेक विद्वान ब्राह्मणों ने उनके प्रस्ताव का अनुमोदन किया।
3-अश्वमेध यज्ञ के लिए यज्ञभूमि कहां बनाने की बात कही गई?
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, ऋषियों ने सरयू नदी के उत्तर तट पर यज्ञभूमि तैयार कराने की सलाह दी थी।
4-राजा दशरथ के प्रस्ताव पर मंत्रियों और ब्राह्मणों ने क्या कहा?
मंत्रियों ने राजा की आज्ञा स्वीकार करते हुए यज्ञ की व्यवस्था करने की सहमति दी। ब्राह्मणों ने भी इसे उत्तम विचार बताते हुए कहा कि यज्ञ के प्रभाव से राजा को मनोवांछित पुत्र की प्राप्ति होगी।
5-यज्ञ का संकल्प सुनकर राजा की रानियों की क्या प्रतिक्रिया हुई?
राजा दशरथ ने रानियों से भी दीक्षा ग्रहण करने के लिए कहा। यह सुनकर उनके मन में पुत्र प्राप्ति की आशा और प्रसन्नता जाग उठी।











