अयोध्या की समृद्धि और व्यवस्था केवल राजा दशरथ के पराक्रम का परिणाम नहीं थी, बल्कि उनके साथ कार्य करने वाली एक अत्यन्त योग्य और बुद्धिमान मन्त्रिपरिषद् का भी इसमें बड़ा योगदान था। लव-कुश आगे बताते हैं कि इक्ष्वाकु वंशी महाराज दशरथ के पास आठ ऐसे मन्त्री थे, जो न केवल नीति और शासन के ज्ञाता थे, बल्कि मनुष्य के हाव-भाव देखकर ही उसके मन की बात समझ लेते थे।
ये सभी मन्त्री सदैव राजा के हित और राज्य की उन्नति में लगे रहते थे। उनके नाम थे- धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और आठवें सुमन्त्र, जो अर्थशास्त्र के विशेष ज्ञाता थे।
इन मन्त्रियों के साथ-साथ महर्षि वसिष्ठ और वामदेव जैसे महान ऋषि राजा के पुरोहित थे। इनके अतिरिक्त सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, दीर्घायु मार्कण्डेय और कात्यायन जैसे विद्वान भी राजसभा में सम्मिलित थे। इस प्रकार अयोध्या की सभा केवल राजनीतिक ही नहीं, बल्कि आध्यात्मिक और बौद्धिक दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध थी। राजा दशरथ के ये मन्त्री इतने कुशल थे कि अपने राज्य ही नहीं, शत्रु राज्यों की गतिविधियों की भी पूरी जानकारी रखते थे।
गुप्तचरों के माध्यम से वे यह जानते रहते थे कि अन्य राजा क्या कर रहे हैं, क्या कर चुके हैं और आगे क्या करने वाले हैं। वे व्यवहार में अत्यन्त निपुण और परखे हुए थे। उनकी निष्ठा की कई बार परीक्षा हो चुकी थी। वे न्याय के प्रति इतने दृढ़ थे कि आवश्यकता पड़ने पर अपने ही पुत्र को दण्ड देने में भी संकोच नहीं करते थे।
राज्य की सुरक्षा और समृद्धि के लिये वे कोष (धन) और चतुरंगिणी सेना- हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक का सदैव ध्यान रखते थे। परन्तु उनकी नीति केवल शक्ति पर आधारित नहीं थी, बल्कि धर्म और न्याय पर आधारित थी।
यदि शत्रु ने कोई अपराध नहीं किया हो, तो वे उस पर आक्रमण नहीं करते थे। वे सदैव नीति के अनुसार कार्य करते और अपने राज्य के सत्पुरुषों की रक्षा करते थे। मन्त्रीगण ब्राह्मणों और क्षत्रियों को कष्ट पहुँचाए बिना न्यायपूर्ण उपायों से राज्य का खजाना भरते थे। वे अपराधी के बल और परिस्थिति को देखकर ही दण्ड देते। जहाँ कठोरता आवश्यक होती, वहाँ कठोर दण्ड और जहाँ मृदुता उचित होती, वहाँ नरम व्यवहार करते।
अपने श्रेष्ठ गुणों के कारण वे सभी मन्त्री राजा के लिये गुरु के समान आदरणीय थे। उनके पराक्रम और बुद्धिमत्ता की ख्याति केवल अयोध्या तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि दूर-दूर के देशों में भी प्रसिद्ध थी। वे किसी भी निर्णय पर पहुँचने से पहले गहराई से विचार करते थे और फिर ही नीति के अनुसार कार्य करते थे।
राजा दशरथ स्वयं भी महान पराक्रमी और तेजस्वी थे। उन्हें अपने समान या उनसे बड़ा कोई शत्रु नहीं मिला था। उनके मित्रों की संख्या अत्यधिक थी और सभी सामन्त राजा के प्रति श्रद्धा रखते हुए उनके चरणों में नत रहते थे।
उनके प्रभाव से राज्य के सभी शत्रु, चोर और दुष्ट प्रवृत्तियाँ समाप्त हो चुकी थीं। जैसे देवराज इन्द्र स्वर्ग में रहकर तीनों लोकों का पालन करते हैं, वैसे ही राजा दशरथ अयोध्या में रहकर सम्पूर्ण पृथ्वी का शासन करते थे। और जैसे सूर्य अपनी किरणों से प्रकाशित होकर शोभायमान होता है, उसी प्रकार राजा दशरथ अपने तेजस्वी मन्त्रियों से घिरे हुए अत्यन्त प्रभावशाली प्रतीत होते थे।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-राजा दशरथ के कितने प्रमुख मंत्री थे?
राजा दशरथ के आठ प्रमुख मंत्री थे-धृष्टि, जयन्त, विजय, सुराष्ट्र, राष्ट्रवर्धन, अकोप, धर्मपाल और सुमन्त्र।
2-राजा दशरथ के मंत्रियों की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
वे नीति और शासन के ज्ञाता थे तथा मनुष्य के हाव-भाव देखकर उसके मन की बात समझने में कुशल माने जाते थे। वे सदैव राजा और राज्य के हित में कार्य करते थे।
3-दशरथ की राजसभा में किन ऋषियों और विद्वानों का स्थान था?
महर्षि वसिष्ठ और वामदेव राजा के पुरोहित थे। इनके अलावा सुयज्ञ, जाबालि, कश्यप, गौतम, मार्कण्डेय और कात्यायन जैसे विद्वान भी राजसभा में सम्मिलित थे।
4-राजा दशरथ के मंत्री अपराधियों को दण्ड कैसे देते थे?
मंत्री अपराधी के बल, परिस्थिति और अपराध को ध्यान में रखकर दण्ड निर्धारित करते थे। आवश्यकता के अनुसार कठोरता या मृदुता अपनाते हुए न्यायपूर्ण निर्णय लिया जाता था।
5-राज्य की सुरक्षा के लिए मंत्री किन बातों का ध्यान रखते थे?
मंत्री गुप्तचरों के माध्यम से शत्रु राज्यों की गतिविधियों की जानकारी रखते थे और कोष तथा चतुरंगिणी सेना-हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिक की व्यवस्था पर विशेष ध्यान देते थे।











