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वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड, सर्ग 10 : अंगदेश में ऋष्यश्रृंग के आने तथा शान्ता के साथ विवाह होने के प्रसंग का वर्णन

वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड सर्ग 10 में ऋष्यशृंग मुनि को अंगदेश लाने, उनके आगमन पर वर्षा होने और राजा रोमपाद द्वारा पुत्री शान्ता से उनका विवाह कराने का वर्णन है।

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वाल्मीकि रामायण बालकाण्ड सर्ग 10

सुमन्त्र ने राजा दशरथ को आगे बताते हुए उस अद्भुत उपाय का वर्णन किया, जिसके द्वारा अंगदेश के राजा रोमपाद ने वन में रहने वाले महान तपस्वी ऋष्यशृंग को अपने राज्य में बुलवाया था। उन्होंने कहा, ‘राजन्! जब अंगदेश में भयंकर अकाल पड़ा और प्रजा दुःख से व्याकुल हो उठी, तब मन्त्रियों और पुरोहितों ने मिलकर एक योजना बनाई। उन्होंने राजा से कहा, ‘यदि मनोहर रूपवाली, सुन्दर आभूषणों से सुसज्जित स्त्रियाँ वन में जाएँ, तो वे अपने मधुर व्यवहार और आकर्षण से उस मुनिकुमार को नगर तक ला सकती हैं।’ राजा की आज्ञा पाकर नगर की प्रमुख वेश्याएँ उस वन की ओर चल पड़ीं, जहाँ ऋष्यशृंग अपने पिता विभाण्डक के साथ निवास करते थे।

ऋष्यशृंग का जीवन अत्यन्त पवित्र और एकान्तमय था। उन्होंने अपने जन्म से लेकर उस समय तक न तो किसी स्त्री को देखा था और न ही अपने पिता के अतिरिक्त किसी अन्य मनुष्य से परिचय पाया था। उनका मन पूर्णतः निष्कलुष और सरल था। एक दिन वे संयोगवश उस स्थान पर पहुँच गये, जहाँ वे स्त्रियाँ ठहरी हुई थीं। जब उन सुन्दरियों ने उस तेजस्वी मुनिकुमार को देखा, तो वे प्रसन्न होकर उनके समीप आयीं। ऋष्यशृंग ने पहले कभी ऐसा रूप नहीं देखा था। उन स्त्रियों की मधुरता, सौन्दर्य और विनम्र व्यवहार ने उनके हृदय में एक नया, अनजान सा स्नेह जगा दिया।

सरल हृदय ऋषि कुमार ने उनसे कहा, ‘आप सब मेरे आश्रम पधारें।’ स्त्रियाँ भी अवसर को समझते हुए उनके साथ आश्रम पहुँचीं। वहाँ उन्होंने बड़ी चतुराई से उनका आदर किया, उन्हें विविध स्वादिष्ट पदार्थ और मिठाइयाँ खिलाईं तथा स्नेहपूर्वक उनसे व्यवहार किया। जब वे लौटने लगीं, तो जाते-जाते उन्होंने ऋष्यशृंग को आलिंगन भी किया। यह अनुभव ऋष्यशृंग के लिये बिल्कुल नया था। उनके चले जाने के बाद ऋष्यशृंग का मन विचलित हो उठा। वे उन अनुभवों को भूल नहीं पा रहे थे।

उनका मन बार-बार उन्हीं की ओर आकर्षित होने लगा और वे व्याकुल होकर इधर-उधर टहलते रहे। अगले दिन वे पुनः उसी स्थान पर पहुँचे। इस बार वे स्त्रियाँ पहले से ही तैयार थीं। उन्होंने प्रसन्नता से उनका स्वागत किया और अपने मधुर व्यवहार से उन्हें धीरे-धीरे अपने साथ अंगदेश ले आयीं। जैसे ही ऋष्यशृंग ने अंगदेश में प्रवेश किया, वैसे ही इन्द्रदेव ने प्रसन्न होकर वर्षा प्रारम्भ कर दी। सूखे से त्रस्त भूमि पर जीवन लौट आया और समस्त राज्य में हर्ष छा गया। राजा रोमपाद समझ गये कि महान तपस्वी ऋष्यशृंग आ चुके हैं।

उन्होंने अत्यन्त श्रद्धा और सम्मान के साथ उन्हें अपने महल में स्थान दिया। इसके बाद राजा ने अपनी पुत्री शान्ता का विवाह विधिपूर्वक ऋष्यशृंग के साथ कर दिया। इस शुभ अवसर पर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए। ऋष्यशृंग मुनि भी वहाँ सम्मानपूर्वक रहने लगे और अपनी धर्मपत्नी शान्ता के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-ऋष्यशृंग मुनि को अंगदेश क्यों बुलाया गया था?

अंगदेश में भयंकर अकाल पड़ा था। ब्राह्मणों और मंत्रियों ने राजा रोमपाद को ऋष्यशृंग मुनि को राज्य में लाने का उपाय बताया।

2-ऋष्यशृंग मुनि को वन से अंगदेश कैसे लाया गया?

राजा रोमपाद की अनुमति से कुछ स्त्रियों को वन में भेजा गया। उन्होंने अपने मधुर व्यवहार से ऋष्यशृंग को अपने साथ अंगदेश आने के लिए तैयार किया।

3-ऋष्यशृंग के अंगदेश पहुंचते ही क्या हुआ?

ऋष्यशृंग के अंगदेश में प्रवेश करते ही इन्द्रदेव ने वर्षा शुरू कर दी। इससे सूखे से परेशान प्रजा को राहत मिली और राज्य में फिर से प्रसन्नता छा गई।

4-ऋष्यशृंग मुनि का विवाह किससे हुआ था?

ऋष्यशृंग मुनि का विवाह राजा रोमपाद की पुत्री शान्ता से हुआ था। विवाह के बाद वे अंगदेश में शान्ता के साथ रहने लगे।

5-ऋष्यशृंग और शान्ता के विवाह का राजा रोमपाद से क्या संबंध था?

राजा रोमपाद ने ऋष्यशृंग के सम्मान में अपनी पुत्री शान्ता का विवाह उनसे कराया। इससे ऋष्यशृंग अंगदेश के राजपरिवार से जुड़ गए।

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