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श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 15, 16, 17, 18 : श्रीकृष्ण, अर्जुन और पाण्डवों ने कौन-कौन से शंख बजाए?

भगवद्गीता के श्लोक 15 से 18 में श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और अन्य पाण्डव योद्धाओं के दिव्य शंखों के नाम और शंखनाद का वर्णन है।

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Bhagavad Gita Chapter 1 Shlokas 15-18

श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 15, 16, 17, 18-

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः। पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः॥ 15॥

पाञ्चजन्यम्, हृषीकेशः, देवदत्तम्, धनञ्जयः, पौण्ड्रम्, दध्मौ, महाशङ्खम्, भीमकर्मा, वृकोदरः॥

हृषीकेशः = श्रीकृष्ण महाराज ने , पाञ्चजन्यम् = पांचजन्य नामक, धनञ्जयः = अर्जुन ने, देवदत्तम् = देवदत्त नामक (शंख) , भीमकर्मा = भयानक कर्म वाले , वृकोदरः = भीमसेन ने ,पौण्ड्रम् = पौण्ड्र नामक , महाशङ्खम् = महाशंख , दध्मौ = बजाया।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ॥ 16 ॥

अनन्तविजयम्, राजा, कुन्तीपुत्रः, युधिष्ठिरः, नकुलः, सहदेवः, च, सुघोष-मणिपुष्पकौ॥

कुन्तीपुत्रः = कुन्तीपुत्र , राजा = राजा , युधिष्ठिरः = युधिष्ठिर ने , अनन्तविजयम् = अनन्तविजय नामक (शंख), नकुलः = नकुल ने , सहदेवः = सहदेव ने ,सुघोष-मणिपुष्पकौ = सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख।

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ॥ 17॥

काश्यः, च, परमेष्वासः, शिखण्डी, च, महारथः, धृष्टद्युम्नः, विराटः, च, सात्यकिः, च, अपराजितः॥

काश्यः = काशिराज ,परमेष्वासः = श्रेष्ठ धनुर्धारी, शिखण्डी = शिखण्डी , महारथः = महारथी ,धृष्टद्युम्नः = धृष्टद्युम्न , विराटः = राजा विराट, सात्यकिः = सात्यकि, अपराजितः = अजेय।

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान्दध्मुः पृथक् पृथक् ॥ 18॥

द्रुपदः, द्रौपदेयाः, च, सर्वशः, पृथिवीपते, सौभद्रः, च, महाबाहुः, शङ्खान्, दध्मुः, पृथक् पृथक्॥

द्रुपदः = राजा द्रुपद , द्रौपदेयाः = द्रौपदी के पाँच पुत्र, सौभद्रः = सुभद्रापुत्र अभिमन्यु , महाबाहुः = बड़ी भुजा वाले , पृथिवीपते = हे राजन् , सर्वशः = सब ओर से , पृथक् पृथक् = अलग-अलग, शङ्खान् दध्मुः = शंख बजाये गए।

अर्थ - अन्तर्यामी भगवान् श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य नामक तथा धनञ्जय अर्जुन ने देवदत्त नामक शंख बजाया और भयानक कर्म करनेवाले वृकोदर भीम ने पौण्ड्र नामक महाशंख बजाया। कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाये। श्रेष्ठ धनुषवाले काशिराज और महारथी शिखण्डी तथा धृष्टद्युम्न एवं राजा विराट और अजेय सात्यकि, राजा द्रुपद और द्रौपदी के पाँचों पुत्र तथा लम्बी-लम्बी भुजाओं वाले सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु इन सभी ने सब ओर से अलग-अलग (अपने-अपने) शंख बजाये।

व्याख्या - ‘पाञ्चजन्यं हृषीकेशः’ पद के द्वारा सञ्जय भगवान् श्रीकृष्ण के शंखनाद का वर्णन करते हैं। ‘हृषीकेश’ का अर्थ है -समस्त इन्द्रियों के स्वामी और सबके हृदय की अन्तरतम भावना को जानने वाले परमात्मा। भगवान् श्रीकृष्ण केवल एक योद्धा या सारथी नहीं थे, बल्कि वे सबके अन्तर्यामी और सर्वज्ञ थे। उन्होंने पाण्डवों के पक्ष में खड़े होकर ‘पाञ्चजन्य’ नामक शंख बजाया।

इस शंख का नाम भी विशेष कारण से पड़ा। भगवान् श्रीकृष्ण ने ‘पञ्चजन’ नामक एक दैत्य का वध किया था, जो शंख के रूप में था। उसी दैत्य के शरीर से प्राप्त शंख को भगवान् ने धारण किया, इसलिए उसका नाम ‘पाञ्चजन्य’ प्रसिद्ध हुआ। यह शंख केवल एक युद्ध का वाद्य नहीं था, बल्कि धर्म की विजय और अधर्म के विनाश की उद्घोषणा का प्रतीक था।

‘देवदत्तं धनञ्जयः’ पद अर्जुन के शंख का वर्णन करता है। अर्जुन का एक नाम ‘धनञ्जय’ है, जिसका अर्थ है -धन को जीतने वाला। राजसूय यज्ञ के समय अर्जुन ने अनेक राजाओं को पराजित करके अपार धन एकत्र किया था, इसलिए वे धनञ्जय कहलाए। अर्जुन का शंख ‘देवदत्त’ नाम से प्रसिद्ध था। यह शंख उन्हें इन्द्रदेव से प्राप्त हुआ था, जब अर्जुन ने निवातकवच आदि दैत्यों से युद्ध किया था। इस शंख की ध्वनि अत्यंत प्रचण्ड और प्रभावशाली थी। इसके नाद से शत्रु-सेना के हृदय में भय उत्पन्न हो जाता था। जब अर्जुन ने इस शंख को बजाया, तो वह केवल एक ध्वनि नहीं थी, बल्कि धर्म, साहस और विजय की उद्घोषणा थी।

‘पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः’ पद में भीमसेन के शंखनाद का वर्णन है। भीमसेन का एक नाम ‘भीमकर्मा’ है, क्योंकि उन्होंने हिडिम्बासुर, बकासुर, जटासुर और जरासन्ध जैसे महान् और भयंकर शत्रुओं का वध किया था। उनका एक अन्य नाम ‘वृकोदर’ भी है। इसका कारण यह है कि उनके उदर में ‘वृक’ नाम की विशेष अग्नि थी, जिससे वे अत्यधिक भोजन पचा सकते थे। भीमसेन का शंख ‘पौण्ड्र’ नामक था, जो अत्यंत विशाल और भयंकर ध्वनि वाला था। जब उन्होंने इस महाशंख को बजाया, तो उसकी ध्वनि से युद्धभूमि गूँज उठी और शत्रुओं के हृदय में भय उत्पन्न हो गया। यह उनके बल, साहस और युद्ध-पराक्रम का प्रतीक था।

इसके बाद सञ्जय धर्मराज युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव के शंखनाद का वर्णन करते हैं- ‘अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः, नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।’ यहाँ युधिष्ठिर के लिए ‘कुन्तीपुत्र’ विशेषण का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया गया है कि अर्जुन, भीम और युधिष्ठिर ये तीनों कुन्ती के पुत्र हैं, जबकि नकुल और सहदेव माद्री के पुत्र हैं। युधिष्ठिर को ‘राजा’ कहने का भी विशेष महत्व है।

वे वनवास से पूर्व इन्द्रप्रस्थ के राजा थे, और नियम के अनुसार वनवास और अज्ञातवास पूरा करने के बाद उन्हें पुनः राजा बनना ही था। यह विशेषण इस बात का भी संकेत करता है कि आगे चलकर युधिष्ठिर ही सम्पूर्ण पृथ्वी के सम्राट बनेंगे। युधिष्ठिर ने ‘अनन्तविजय’ नामक शंख बजाया, जबकि नकुल और सहदेव ने क्रमशः ‘सुघोष’ और ‘मणिपुष्पक’ नामक शंख बजाए। ये सभी शंख दिव्यता, धर्म और विजय के प्रतीक थे।

इसके बाद सञ्जय अन्य महारथियों का वर्णन करते हैं-‘काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः, धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः, द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते, सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खान् दध्मुः पृथक्पृथक्।’ काशिराज महान् धनुर्धारी थे, शिखण्डी एक पराक्रमी महारथी थे, जो पूर्व जन्म में अम्बा नामक स्त्री थे और बाद में पुरुष बने। भीष्मजी उन्हें स्त्री मानते थे और उन पर शस्त्र नहीं चलाते थे। युद्ध में अर्जुन ने शिखण्डी को आगे करके भीष्मजी को पराजित किया।

धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँच पुत्र और सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु-ये सभी महान् योद्धा थे। विशेष रूप से अभिमन्यु अत्यंत वीर और पराक्रमी थे। उन्होंने चक्रव्यूह में प्रवेश करके अनेक शत्रुओं का संहार किया और अन्त में अन्यायपूर्वक घेरकर उनका वध किया गया।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि सञ्जय ने कौरव पक्ष में केवल भीष्मजी के शंखनाद का ही प्रमुख रूप से उल्लेख किया, जबकि पाण्डव पक्ष में भगवान् श्रीकृष्ण, अर्जुन, भीम, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव, अभिमन्यु आदि अनेक वीरों का विस्तार से वर्णन किया। इससे यह स्पष्ट होता है कि सञ्जय के हृदय में धर्म के प्रति आदर और श्रद्धा थी।

वे अधर्म के पक्ष का अधिक वर्णन करना उचित नहीं समझते थे, जबकि धर्म के पक्ष का वर्णन करते हुए उन्हें विशेष आनन्द का अनुभव हो रहा था। यह केवल युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि धर्म और अधर्म के बीच के गहरे अंतर को भी प्रकट करता है। पाण्डवों का शंखनाद केवल युद्ध का संकेत नहीं था, बल्कि धर्म, सत्य और न्याय की विजय की उद्घोषणा थी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

1-श्रीकृष्ण, अर्जुन और भीम के शंखों के नाम क्या थे?

भगवान श्रीकृष्ण का शंख पाञ्चजन्य, अर्जुन का देवदत्त और भीमसेन का महाशंख पौण्ड्र नाम से प्रसिद्ध था।

2-युधिष्ठिर, नकुल और सहदेव के शंखों के नाम क्या थे?

युधिष्ठिर ने अनन्तविजय नामक शंख बजाया। नकुल और सहदेव ने क्रमशः सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए।

3-श्लोक 17 और 18 में किन प्रमुख योद्धाओं के शंखनाद का वर्णन है?

इन श्लोकों में काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पांच पुत्र और सुभद्रा-पुत्र अभिमन्यु के शंखनाद का वर्णन किया गया है।

4-भगवान श्रीकृष्ण के शंख का नाम पाञ्चजन्य क्यों पड़ा?

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने पञ्चजन नामक दैत्य का वध किया था और उससे प्राप्त शंख को धारण किया। इसी कारण वह पाञ्चजन्य नाम से प्रसिद्ध हुआ।

5-पाण्डवों के शंखनाद का क्या आध्यात्मिक महत्व माना जाता है?

पौराणिक दृष्टि से पाण्डवों और श्रीकृष्ण का शंखनाद धर्म, सत्य, साहस और न्याय के पक्ष की उद्घोषणा के रूप में देखा जाता है। उनके साथ अनेक प्रमुख योद्धाओं का शंखनाद भी हुआ।

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