श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 1, श्लोक 10 -
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्। पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम् ॥ 10 ॥
अपर्याप्तम्, तत्, अस्माकम्, बलम्, भीष्माभि-रक्षितम्, पर्याप्तम्, तु, इदम्, एतेषाम्, बलम्, भीमाभि-रक्षितम्॥
अपर्याप्तम् = सब प्रकार से अजेय है , तत् = वह , अस्माकम् = हमारी , बलम् = सेना , भीष्माभिरक्षितम् = भीष्म पितामह द्वारा रक्षित , पर्याप्तम् = जीतने में सुगम है , तु = और, इदम् = यह , एतेषाम् = इन लोगों की , बलम् = सेना , भीमाभिरक्षितम् = भीम द्वारा रक्षित।
अर्थ - भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना सब प्रकार से अजेय है, और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों की यह सेना जीतने में सुगम है।
व्याख्या - कौरव-सेना को देखकर अर्जुन किसी के पास नहीं जाते और न ही किसी से सलाह लेते हैं, बल्कि स्वयं हाथ में धनुष उठाकर युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं (गीता 1।20)। इसके विपरीत, दुर्योधन पाण्डवों की सेना को देखकर सीधे द्रोणाचार्य के पास जाता है और उनसे उस व्यूहबद्ध सेना को देखने के लिए कहता है। यह अंतर स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि दुर्योधन के हृदय में भीतर ही भीतर भय बैठा हुआ है।
वह स्वयं में दृढ़ नहीं है, इसलिए उसे गुरु का सहारा लेना पड़ता है। यद्यपि वह बाहर से आत्मविश्वास दिखाने का प्रयास करता है, परंतु उसके भीतर असुरक्षा और घबराहट छिपी हुई है। इसी भय के कारण वह द्रोणाचार्य को प्रसन्न करने और उन्हें पाण्डवों के विरुद्ध उकसाने की चेष्टा करता है।
दुर्योधन के हृदय में अधर्म, अन्याय और पाप भरा हुआ है। जो व्यक्ति अन्यायी और पापी होता है, वह कभी भी वास्तविक शांति और निर्भयता प्राप्त नहीं कर सकता यह जीवन का शाश्वत नियम है। भीतर से वह सदैव अशांत और भयभीत रहता है, चाहे बाहर से कितना ही बलवान क्यों न दिखाई दे। इसके विपरीत, अर्जुन के भीतर धर्म और न्याय का भाव है। इसलिए उसके मन में न तो स्वार्थसिद्धि की चालाकी है और न ही किसी प्रकार का भय।
उसके भीतर उत्साह, साहस और वीरता है। यही कारण है कि वह निडर होकर भगवान श्रीकृष्ण से कहता है- “हे अच्युत ! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कर दीजिए” (गीता 1। 21)। यह उसके आत्मविश्वास और धर्मनिष्ठा का प्रतीक है।
इस प्रसंग से यह स्पष्ट होता है कि जिस व्यक्ति का आश्रय नश्वर धन-संपत्ति, पद, वैभव और सांसारिक सुखों पर होता है, और जिसके भीतर अधर्म, अन्याय और दुर्भावना होती है, उसके भीतर वास्तविक बल नहीं होता। वह भीतर से खोखला होता है और कभी भी निश्चिन्त नहीं रह सकता। उसका आत्मविश्वास केवल दिखावा होता है।
इसके विपरीत, जिस व्यक्ति के भीतर धर्म का पालन और भगवान का आश्रय होता है, वह सदा निर्भय, शांत और दृढ़ रहता है। उसका बल सच्चा और स्थायी होता है। इसलिए जो साधक अपना वास्तविक कल्याण चाहते हैं, उन्हें अधर्म और अन्याय का पूर्णतः त्याग करके केवल भगवान का आश्रय लेना चाहिए और भगवत्प्रीति के लिए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए।
भौतिक संपत्ति को अधिक महत्व देना और क्षणिक सुखों के प्रलोभन में फँसकर अधर्म का मार्ग अपनाना कभी हितकारी नहीं होता। इससे मनुष्य का कल्याण नहीं, बल्कि अंततः अहित ही होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)-
1-भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 10 में दुर्योधन ने अपनी सेना के बारे में क्या कहा?
दुर्योधन ने कहा कि भीष्म पितामह द्वारा सुरक्षित उसकी सेना अजेय है, जबकि भीम द्वारा रक्षित पाण्डवों की सेना को उसने जीतने में सुगम बताया।
2-दुर्योधन पाण्डवों की सेना देखकर द्रोणाचार्य के पास क्यों गया?
प्रसंग के अनुसार, दुर्योधन ने द्रोणाचार्य का ध्यान पाण्डवों की सुव्यवस्थित सेना और प्रमुख योद्धाओं की ओर आकर्षित किया। इससे वह अपनी सेना और युद्धनीति के प्रति उन्हें सजग करना चाहता था।
3-इस श्लोक में भीष्म और भीम का उल्लेख क्यों किया गया है?
श्लोक में दुर्योधन अपनी सेना के रक्षक के रूप में भीष्म पितामह और पाण्डवों की सेना के रक्षक के रूप में भीम का उल्लेख करता है। इससे दोनों सेनाओं की शक्ति की तुलना सामने आती है।
4-इस श्लोक से अधर्म और धर्म के संबंध में क्या सीख मिलती है?
दी गई व्याख्या के अनुसार, बाहरी शक्ति, धन या वैभव वास्तविक निर्भयता की गारंटी नहीं देते। धर्म, कर्तव्य और ईश्वर के आश्रय से मनुष्य के भीतर स्थिरता, साहस और आत्मविश्वास विकसित होता है।
5-भगवद्गीता अध्याय 1 श्लोक 10 का मुख्य संदेश क्या है?
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि केवल बड़ी सेना या बाहरी शक्ति पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के आंतरिक भाव, धर्मनिष्ठा और अपने कर्तव्य के प्रति दृढ़ता भी महत्वपूर्ण हैं।










