धृतराष्ट्र उवाच :
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः, मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥1॥
धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे, समवेताः, युयुत्सवः, मामकाः, पाण्डवाः, च, एव, किम्, अकुर्वत, सञ्जय॥
धृतराष्ट्र = राजा धृतराष्ट्र , उवाच = बोले , धर्मक्षेत्रे = धर्मभूमि में , कुरुक्षेत्रे = कुरुक्षेत्र में ,समवेताः = एकत्र हुए, युयुत्सवः = युद्ध की इच्छा वाले , मामकाः = मेरे पुत्र, पाण्डवाः = पाण्डु के पुत्र, च = और, एव = ही, किम् = क्या, अकुर्वत = किया, सञ्जय = हे संजय।
अर्थ - राजा धृतराष्ट्र बोले- हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए मेरे पुत्रों और पाण्डवों ने वहाँ क्या किया?
व्याख्या - श्लोक में आए ‘धर्मक्षेत्रे’ और ‘कुरुक्षेत्रे’ शब्दों का अत्यंत गूढ़ अर्थ है। कुरुक्षेत्र केवल एक युद्धभूमि नहीं, बल्कि प्राचीन काल से ही पवित्र तीर्थभूमि रहा है। यहाँ देवताओं ने यज्ञ किए थे और राजा कुरु ने कठोर तपस्या की थी। इसी कारण यह भूमि धर्ममय कार्यों की साक्षी बनी और ‘धर्मभूमि’ कहलायी। धृतराष्ट्र द्वारा ‘क्षेत्र’ शब्द का प्रयोग यह दर्शाता है कि यह उनके वंश की पैतृक भूमि थी, जिस पर कौरवों और पाण्डवों दोनों का समान अधिकार था।
साथ ही, यह भूमि ऐसी थी जहाँ रहकर मनुष्य पुण्य कर्म करके अपना आध्यात्मिक कल्याण कर सकता था। भारतीय संस्कृति में किसी भी महत्वपूर्ण कार्य को धर्म के आधार पर ही किया जाता है, यहाँ तक कि युद्ध जैसा कठोर कर्म भी धर्मभूमि पर ही किया जाता था, जिससे मरने वालों का उद्धार हो सके। इसलिए ‘कुरुक्षेत्रे’ के साथ ‘धर्मक्षेत्रे’ शब्द जोड़कर यह बताया गया कि यह युद्ध केवल सत्ता के लिए नहीं, बल्कि धार्मिक मर्यादा के अंतर्गत लड़ा जा रहा था। इसके माध्यम से गीता यह भी संकेत देती है कि जीवन के प्रत्येक कार्य में धर्म को प्राथमिकता देनी चाहिए।
‘समवेता युयुत्सवः’ पद से यह स्पष्ट होता है कि दोनों सेनाएँ युद्ध की इच्छा से एकत्रित हुई थीं। यद्यपि पाण्डवों ने कई बार संधि का प्रयास किया और स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने भी शांति का संदेश दिया, फिर भी दुर्योधन ने किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार नहीं किया। उसने यहाँ तक कह दिया कि वह सुई की नोक के बराबर भूमि भी पाण्डवों को नहीं देगा। इसी हठ और अहंकार के कारण युद्ध अनिवार्य हो गया।
दुर्योधन का मुख्य उद्देश्य किसी भी प्रकार राज्य प्राप्त करना था, चाहे वह धर्म से हो या अधर्म से, न्याय से हो या अन्याय से। उसके लिए सत्ता ही सर्वोपरि थी। इसलिए वह विशेष रूप से युद्ध का इच्छुक था। दूसरी ओर, पाण्डवों की प्रवृत्ति धर्मप्रधान थी। वे चाहते थे कि बिना युद्ध के जीवन निर्वाह हो जाए, तो भी वे धर्म का त्याग न करें। महाराज युधिष्ठिर तो युद्ध से बचना चाहते थे, परंतु माता कुन्ती की आज्ञा और क्षत्रिय धर्म के पालन के कारण उन्हें युद्ध स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार कौरव सत्ता के लोभ से और पाण्डव धर्म-पालन के कारण युद्धभूमि में आए। इससे स्पष्ट होता है कि दोनों पक्षों की युद्ध-इच्छा के पीछे की भावना भिन्न थी।
‘मामकाः पाण्डवाश्चैव’ पदों में धृतराष्ट्र का आंतरिक भाव प्रकट होता है। पाण्डव उन्हें पिता समान मानते थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे, फिर भी धृतराष्ट्र के मन में अपने पुत्रों के प्रति विशेष मोह था। उन्होंने कौरवों के लिए ‘मामकाः’ अर्थात् ‘मेरे’ शब्द का प्रयोग किया, जबकि पाण्डवों को अलग से ‘पाण्डवाः’ कहा। इससे उनका पक्षपात स्पष्ट झलकता है। यही द्वैधभाव आगे चलकर पूरे वंश के विनाश का कारण बना। इससे शिक्षा मिलती है कि परिवार, समाज और राष्ट्र में भेदभाव और पक्षपात विनाश को जन्म देता है।
आगे ‘एव’ शब्द यह दर्शाता है कि पाण्डव जैसे धर्मात्मा लोग भी युद्ध के लिए आए, तो उन्होंने वहाँ क्या किया? यह जानने की उत्सुकता धृतराष्ट्र को थी। ‘किमकुर्वत’ में ‘किम्’ शब्द का प्रयोग यहाँ प्रश्न के अर्थ में हुआ है, न कि निन्दा या विकल्प के रूप में। धृतराष्ट्र युद्ध की घटनाओं को विस्तार से जानना चाहते थे, इसलिए उन्होंने सञ्जय से प्रश्न किया। वे युद्ध के परिणाम को लेकर चिंतित थे, पर अपने मोह के कारण सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं कर पा रहे थे। इस प्रकार यह श्लोक केवल युद्ध का वर्णन नहीं करता, बल्कि मानव मन की आसक्ति, पक्षपात, धर्मबोध और कर्तव्यबुद्धि का भी गहरा चित्र प्रस्तुत करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के पहले श्लोक में क्या कहा गया है?
पहले श्लोक में धृतराष्ट्र संजय से पूछते हैं कि धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में युद्ध की इच्छा से एकत्र हुए उनके पुत्रों और पाण्डवों ने क्या किया।
2-कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहा गया है?
कुरुक्षेत्र प्राचीन काल से धार्मिक और पवित्र भूमि मानी जाती रही है। इसी कारण गीता में इसे ‘धर्मक्षेत्र’ कहा गया है।
3-धृतराष्ट्र ने कौरवों के लिए ‘मामकाः’ शब्द का प्रयोग क्यों किया?
‘मामकाः’ का अर्थ है ‘मेरे’। धृतराष्ट्र का यह शब्द अपने पुत्रों के प्रति उनके मोह और पक्षपात को दर्शाता है।
4-भगवद्गीता के पहले श्लोक में धृतराष्ट्र किससे प्रश्न करते हैं?
धृतराष्ट्र अपने सारथी और विश्वसनीय संदेशवाहक संजय से कुरुक्षेत्र में कौरवों और पाण्डवों की गतिविधियों के बारे में प्रश्न करते हैं।
5-भगवद्गीता के प्रथम श्लोक से क्या शिक्षा मिलती है?
यह श्लोक बताता है कि मोह, पक्षपात और आसक्ति मनुष्य की निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। जीवन में धर्म और कर्तव्य को प्राथमिकता देना आवश्यक है।