भगवद्गीता में ‘समता’ को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। श्रीकृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि समता ही योग है। लेकिन समता का वास्तविक अर्थ क्या है, और यह साधन तथा साध्य दोनों कैसे है। इसे समझना आवश्यक है।
समता का वास्तविक अर्थ-
समता का सामान्य अर्थ है- हर परिस्थिति में मन का संतुलित रहना। सुख आए या दुःख, लाभ हो या हानि, मान मिले या अपमान इन सब स्थितियों में जिसका मन विचलित नहीं होता, वही समता को प्राप्त होता है। यह केवल भावनाओं को दबाने का नाम नहीं है, बल्कि भीतर से स्थिर और शांत रहने की अवस्था है।
समता साधन के रूप में-
समता को साधन इसलिए कहा गया है क्योंकि यह आध्यात्मिक मार्ग पर चलने का एक आवश्यक अभ्यास है। जब तक मनुष्य अपने मन को संतुलित नहीं रखता, तब तक वह सही निर्णय नहीं ले सकता। मन यदि हर छोटी-सी घटना से प्रभावित होता रहेगा, तो वह कभी भी स्थिर नहीं हो पाएगा। इसलिए साधक को प्रारंभ में समता का अभ्यास करना पड़ता है।
जब मनुष्य समता का अभ्यास करता है, तब वह धीरे-धीरे बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होना कम कर देता है। वह समझने लगता है कि सुख और दुःख दोनों ही अस्थायी हैं। यह समझ ही उसे भीतर से मजबूत बनाती है और उसके मन में स्थिरता लाती है।
समता साध्य के रूप में-
समता को साध्य इसलिए कहा गया है क्योंकि यह स्वयं एक अंतिम अवस्था भी है। जब साधक निरंतर अभ्यास करता है, तब एक समय ऐसा आता है जब समता उसकी स्वाभाविक अवस्था बन जाती है। तब उसे अलग से प्रयास नहीं करना पड़ता। उसका मन अपने आप ही संतुलित रहता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से समता का अर्थ है- अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होना। जब मनुष्य अपने भीतर के आत्मस्वरूप को पहचान लेता है, तब बाहरी परिस्थितियां उसे प्रभावित नहीं कर पातीं। यह स्थिति ही समता की पराकाष्ठा है।
समता का अभ्यास कैसे करें?
समता का अभ्यास करने के लिए सबसे पहले मनुष्य को अपने विचारों पर ध्यान देना होगा। जब भी कोई परिस्थिति आती है, तो मन तुरंत प्रतिक्रिया करता है। यदि हम उस प्रतिक्रिया को समझ लें और उसे नियंत्रित करें, तो हम समता की ओर बढ़ सकते हैं।
दूसरा महत्वपूर्ण पहलू है- निष्काम भाव। जब हम अपने कर्मों को फल की इच्छा से करते हैं, तो हम परिणाम से जुड़ जाते हैं। परिणाम अनुकूल न होने पर हम दुःखी हो जाते हैं। लेकिन यदि हम अपने कर्मों को बिना फल की इच्छा के करते हैं, तो हम समता बनाए रख सकते हैं।
आज के जीवन में समता की आवश्यकता और भी अधिक है। तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चितता के बीच मनुष्य का मन आसानी से विचलित हो जाता है। ऐसे में यदि वह समता का अभ्यास करता है, तो वह मानसिक रूप से मजबूत और शांत रह सकता है।
समता से स्थायी शांति की प्राप्ति-
समता हमें यह सिखाती है कि जीवन में हर स्थिति को समान दृष्टि से देखें। न तो अत्यधिक प्रसन्न हों और न ही अत्यधिक दुःखी। यह संतुलन ही हमें स्थायी शांति प्रदान करता है। अंततः, समता केवल एक सिद्धांत नहीं है, बल्कि एक जीवन जीने की कला है। यह साधन भी है और साध्य भी। जब हम इसका अभ्यास करते हैं, तो यह हमें धीरे-धीरे उस अवस्था तक ले जाती है, जहाँ हमारा मन स्थिर और शांत हो जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1-समता का वास्तविक अर्थ क्या है?
समता का अर्थ है सुख-दुःख, लाभ-हानि और मान-अपमान जैसी परिस्थितियों में मन को संतुलित और स्थिर बनाए रखना।
2-समता को साधन क्यों कहा गया है?
समता आध्यात्मिक मार्ग पर मन को स्थिर रखने का अभ्यास है। इसके माध्यम से साधक बाहरी परिस्थितियों से कम प्रभावित होना सीखता है।
3-समता को साध्य क्यों कहा गया है?
जब निरंतर अभ्यास के बाद मनुष्य का मन स्वाभाविक रूप से संतुलित और शांत रहने लगे, तब समता स्वयं एक अंतिम अवस्था बन जाती है।
4-समता का अभ्यास कैसे किया जा सकता है?
अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं को समझकर, उन्हें नियंत्रित करके तथा कर्मों को फल की इच्छा के बिना करने से समता का अभ्यास किया जा सकता है।
5-समता से क्या लाभ होता है?
समता मन को स्थिर और शांत बनाती है। इससे व्यक्ति तनाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चित परिस्थितियों में भी मानसिक रूप से मजबूत रह सकता है।






